Monday, April 22, 2013


बोधिवृक्ष पालवी       प्रज्ञा शील करुणा
तैं आलें आपुलेंपणा    विश्वरुप


मग सरळ सोपे        देह-मन व्यापार
धूत-सर्व-संस्कार       शुचिर्भूत


अनित्याचें लळित      पहावें साक्षीभावें
धरावें सोडावें       अट्टाहासें कांही


देहभावना मरण       शान्त प्राण अपान
अनुभव निर्वाण       आनन्द एकरस


आनन्द ऐसा घन      ज्या ये रीतेंपण
ॠतुंचें आवर्तन        येई जाई

 

जगासवे मीं मिथ्या     ब्रह्मासमा मीं सत्य

लोपलें नित्यानित्य     द्वैत मजठायीं

 

असूनि अता देहीं       नुरली कुण्ठा कांही

वैकुण्ठ हें सदेहीं        पावलो मीं !

 

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